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एक कदम ‘विश्व शांति’ की ओर!

WorldPeace
Written by Tarun Sharma

आजकल हर रोज़ विश्व में आतंकवाद की घटनाएं देखने और सुनने को मिलती हैं। कहीं स्थानीय समुदायों में तनाव है तो कहीं कुछ देशों के बड़े हिस्सों में जंग छिड़ी है। इतने लंबे मानव इतिहास में हम लोग न जाने कब से युद्ध करते आ रहे है लेकिन आजतक हमने कुछ नही सीखा। यदि हम लड़ना छोड़ दे और मिलकर कार्य करें तो इस विश्व का और मानवता का बहुत कल्याण कर सकते हैं।

वैसे तो मानव इतिहास में हिंसा और युद्ध के कई कारण रहे हैं परंतु मैं इस लेख में ऐसे एक कारण की चर्चा करूँगा। वह है धर्म के नाम पर हिंसा। हम हर रोज़ देखते और सुनते हैं कि कहीं कुछ लोग धर्म के नाम पर आतंकी घटनाएँ कर रहे हैं और निर्दोष लोगों को मार रहे हैं तो कहीं से स्थानीय लोग पलायन कर रहे हैं।

इसका एक मूल कारण है धर्मांतरण। ऐसा करने वाले दो बड़े मजहब हैं ईसाईयत और इस्लाम। आरंभ से ही इन मजहबो के द्वारा अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिये तरह-तरह के तरीके अपनाए गये। यह मजहब, धर्म परिवर्तन के लिये बलपूर्वक, प्रलोभन, सेवा, बलात् या धोखे से विवाह जैसे कई तरीके प्रयोग में लाते हैं। जिनसे स्थानीय स्तर पर समुदायों में तनाव और हिंसा बढ़ती है। कई बार यह स्थिति काफी समय के बाद एक बड़े वर्गसंघर्ष या गृहयुद्ध में बदल जाती है।

इन मजहबों के कुछ अनुयायी यह मानते हैं कि केवल उनके मजहब द्वारा बताया गया मार्ग ही सही है और किसी दूसरे के लिये कोई जगह नही है। इस तरह की मानसिकता के चलते इनमें से कुछ लोग आगे चलकर आतंकवादी गतिविधियां करते हैं जिससे समुदायों में और दूरियाँ बढ़ती हैं। आजकल बहुत सी आतंकवादी घटनाओं और घृणा-अपराध का कारण यह ही है।

हर व्यक्ति को अपनी इच्छा से धर्म या मजहब चुनने की या कोई भी मजहब न मानने की स्वत्रंता होनी चाहिये और भविष्य में यदि वह कुछ और चुनना चाहे या वापस अपने पुराने धर्म में जाना चाहे तो उसके लिये भी स्वत्रंता होनी चाहिये। परंतु यह सब न बलपूर्वक तरीके से,  न भय दिखाकर, न मजबूरी का फायदा उठाकर, न सेवा के नाम पर, धन या नौकरी का लालच दिये बिना, दूसरे धर्म या अपने मजहब के बारे में मिथ्या बात न करते हुए, और बिना किसी धोखे के होना चाहिये।

जब यह मजहब 2016 या 1400साल पहले शुरू हुए होंगे तब शायद अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिये इस तरह के धर्मांतरण के तरीकों को उपयोग चलन में आया हो और उन्हें सही भी ठहराया गया हो।

परंतु आज जब दुनिया के अधिकतर देशों के लोग इन मजहबों के अनुयायी हैं और कुछ देशों में तो इनकी संख्या शत प्रतिशत है तब धर्मांतरण की आज क्या जरूरत है?  क्या इन मजहबों को धर्मांतरण पर रोक नही लगानी चाहिये? क्या इन्हें अपने अनुयायियों को धर्मांतरण के लिये किसी भी तरीके के उपयोग के लिये मना नहीं करना चाहिये? क्या इन्हें धर्मांतरण रोककर विश्व में शांति के प्रयासों की दिशा में एक बड़ा कदम नही उठाना चाहिये? क्या इन्हें और अनुयायी बढ़ाने की बजाय अपने अब तक के अनुयायियों की समस्याओं को सुलझाने में अपने संसाधन नही लगाने चाहिये? क्या इनके अनुयायियों को इनसे यह सवाल नही करने चाहिये? और क्या दुनिया के सभी लोगों को विश्व शांति के लिए इन मजहबों के गुरुओं से अपने अनुयायियों को ऐसा समझाने की अपील नही करनी चाहिये?

आज मानवता जहां है, जिस तरह की समस्याओं का सामना कर रही है वह उस समय से अलग है जब  यह मजहब शुरू हुए थे। अतः इस विश्व को एक बेहतर जगह बनाने के लिये और मानवता के विकास का स्वर्णिम अध्याय शुरू करने के लिये सभी धर्मगुरूओं को अपने अनुयायियों से दूसरे धर्म के लोगों के धर्मांतरण के लिये मना करना चाहिये। उनका ऐसा करना निश्चय ही विश्वशांति की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

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